Friday, September 14, 2012

गरिमा

   मैं इस आस्तित्व में सांयोगिक नहीं हूँ। आस्तित्व को मेरी जरुरत है। मैं नहीं हूंगा तो कुछ अधूरा रह जायेगा। यह तथ्य मुझे गरिमा देता है, पूरा आस्तित्व मेरा घर है।
   छोटे छोटे घरों में बंधना नहीं है। शरीर को रहनें के लिए एक मकान काफी होता है, मन के लिए दस भी कम मालूम होते हैं।

No comments:

Post a Comment